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Naagin: Atit Se Parichay

  • Post published:September 11, 2021
  • Post category:Series / Stories
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Naagin: Atit Se Parichay | नागिन: अतीत से परिचय – नागिन कहानी का यह दूसरा भाग है अगर अपने इस नागिन की कहानी का पहला भाग एक थी नागिन नहीं पढ़ा है तो पहले उसे पढ़े उसके बाद इसके दूसरे भाग को पढ़ें। कहानी के हर भाग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

नागिन का पहला भाग पढ़े: Ek Thi Naagin | एक थी नागिन

Naagin: Atit Se Parichay | नागिन: अतीत से परिचय – सब लोग इस बात से चिंतित थे। कि “कौन थी वो” और अचानक से गायब कैसे होगयी। लेकिन कुछ समय बाद वो जब फिर से सबके सामने आयी तो सब लोग फिर से हक्के बक्के गये। और इस बार वो काफी गुस्से में भी थी। क्योकि साधु महाराज ने उसके बारे में काफी भला बुरा बोला था।

जिसके कारन उसे गुस्सा भी आ रहा है। वो साधु से गुस्से में कहती है, “क्या बोल तूने मै खतरनाक साबित हो सकती हूं ?

साधु: देखा महाराज देखा, इस नागिन का जहरीला गुस्सा। ये बहुत ही खतरनाक नागिन है। ये पकड़ में आ जाये इसीलिए मैंने ये बीन बजवाई थी। इस नागिन को मैने जंगल मे देखा था। इसने एक आदिवासी को डस कर मार डाला है।

नागिन: ये तू क्या बोल रहा है ? मैंने आज तक किसी की भी जान नही ली। क्यो जुठ बोल रहा है तू?

साधु: क्यो, अब सच सामने आया तो मै झूठ बोल रहा हूँ। ठीक है तो बोल, तुझे जंगल मे आदिवासीयों ने पकड़ा था कि नही?

नागिन: हा… पकड़ा था।

साधु: फिर वो लोग तुझसे डरकर भाग गए थे कि नही?

नागिन: हा…. ये बात सच है कि वो लोग मुझसे डर गए थे।

Naagin: Atit Se Parichay

साधु: सुना महाराज, इसने क्या बोला। महाराज आपके नए वंश ने अभी अभी इस संसार मे जन्म लिया है, मुझे उसकी चिन्ता है। आपको भी ये सोचना चाहिये।

साधु की बात सुनकर नागिन अपने होश खो देती है और जोर से बोलती है, पापी, पाखंडी ये क्या बोल रहा है तू? तुझे झूठ बोलते हुए थोड़ी सी भी शर्म नही आ रही? तभी विक्रमादित्य नागिन से गुस्से में कहता है, बस-बस, तुम अपना मुंह बंद रखो।

एक साधु से इस तरह बात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?
नागिन कहती है, लेकिन आप मेरी बात तो सुनिए। इसने आपको सिर्फ आधा सच बताया है।

आदिवासीयों ने मुझे पकड़ लिया था। लेकिन ये सच नही है कि मैने किसी की जान ली है। मै आपको बताती हूँ कि उस रात हुआ क्या था।

अब नागिन जंगल में आखिर हुआ क्या था, वो बताना शरू करती है।

उस रात नागिन एक खूबसूरत लड़की के रूप में जंगल में चलते हुए जा रही होती है। तभी कुछ आदिवासी उसको पकड लेते है। वो लड़की घबरा जाती है। आदिवासी उसको पकड़कर उनके मुखिया के पास ले जाते है।

ये सब एक आदमी पेड़ के पीछे छिपकर देख रहा था। अब वो आदिवासी लड़की की बलि चढ़ाने वाले होते है कि तभी उस लड़की का नागिन रूप बहार आने लगता है। लड़की के शरीर पर सर्प की चमड़ी जैसे निशान आने लगते है। उसकी आँखों का रंग बदलता है। वो अपनी जहरीली जीभ बहार निकालती है। तभी आसमान में बिजली कड़कने लगती है और तेज बारिश शरू हो जाती है।

अब देखते ही देखते वो लड़की एक सर्प बन जाती है। ये देखकर आदिवासी डर जाते है और वहां से भाग जाते है फिर वो अपने मनुष्य स्वरुप में आती है और उधर से चलते हुए आगे जाती है।

नागिन की बात सुनकर भी विक्रमादित्य उसपर भरोसा नही कहता है।
और नागिन से कहता है – अब तुम्हें सफाई देने की कोई जरूरत नही है। हम सबने तेरी असलियत देख ली है नागिन।

तुने छुपाई इसका साफ मतलब ये है कि तेरा इरादा गलत है। तू एक नागिन है और तू इस राज्य में विष घोलने के मकसद से आई थी ये साफ साफ दिखाई दे रहा है।

नागिन: नही, ये गलत है। मैने अपना रूप किसी गलत मकसद से नही छुपाया था।

राजा विक्रमादित्य: जेरिली नागिन अब मै तेरी एक बात नही सुनुँगा। तू दूर चली जा मेरी नज़रों से।

ये सुनते ही नागिन लड़की का रूप लेकर विक्रमादित्य के पास जाकर उसके पैरों पर गिर जा ती है और कहती है-
महाराज, ये पंडित झूठ बोल रहा है। मैंने किसी की जान नही ली। इतना बोलते ही लड़की की आखों में आंसू आ जाते है।

लेकिन विक्रमादित्य कोई बात सुनने को राजी नही थे।

राजा विक्रमादित्य गुस्सा होकर उसे को लात मारते है। लड़की यामिनी की पुत्री के पास जाकर गिरती है।

विक्रमादित्य: सिपाहियों, इस नागिन को पकड़ के ले जाओ और इसकी गरदन को धड़ से अलग कर दो।

अब नागिन अपने इस अपमान से गुस्सा होती है। दरबार मे सभी के सामने विक्रमादित्य ने उसे लात मारी और उसका घोर अपमान किया।

लड़की का गुस्सा उसके नागिन रूप को बाहर लाने लगता है। उसके के शरीर पर सर्प की चमड़ी जैसे निशान आने लगते है। उसकी आँखों का रंग बदलता है।

वह अपनी ज़ेरिली जीभ बहार निकालती है। साथ ही उसके के कपड़े उसके नागिन रूप वाले हो जाते है।

वह अपने नागिनरूप में पूरी तरह से परिवर्तित हो जाती है। ये सब देखकर सिपाही डर जाते है और बेला से दूर ही खड़े रहते है।

नागिन चिल्लाते हुए बोलती है- राजा विक्रमादित्य ये तूने ठीक नही किया।
तूने मेरा घोर अपमान किया है। मै एक इच्छाधारी नागिन हूँ और मै तुझसे अपना बदला लेने वापिस आऊँगी।

मै अपना ये दूसरा अपमान नही भुलुंगी। ये सुनते ही विक्रमादित्य आश्चर्य से
बोलता है- दूसरा अपमान…

नागिन: हाँ शैतान, याद हे ना ? तूने सर्पो की बली चढ़ाई थी। जब तुझे एक आखरी सर्प नही मिल रहा था तब तूने मेरी यानिकि नागस्विनी की बली चढ़ाई थी।

ये सुनकर विक्रमादित्य चौक उठता है और कहता है- तुम नागस्विनी?
नागिन कहती है- हाँ, वही नागस्विनी याद आया कुछ?

Naagin: Atit Se Parichay

आजसे पच्चीस साल पहले की बात। नागस्विनी सर्प एक अंधेरी गुफा में शिवलिंग के पास तपस्या कर रही होती है। नागस्विनी इच्छाधारी बनने की इच्छा से महादेव की भक्ति में अपने निन्यानबे साल किसी भी जीव को डसे बिना बिता देती है।

एक दिन उस राज्य के राजा विक्रमादित्य एक यज्ञ कर रहे होते है। विक्रमादित्य अपने बेटे के जन्म की खुशी में महादेव को सौ सर्प की बली चढाने वाले होते है।

अब राजा ने निन्यानवे सर्पो की बली दे दी होती है सिर्फ एक सर्प नही मिल रहा था। तब राजा क्रोधित होते है और सिपाहियों से कहते है- जाओ कुछ भी करके मुझे सर्प लाके दो वरना तुम सबकी में इसी यज्ञ में बली चढ़ा दूंगा।

ये सुनकर सिपाही नागस्विनी के बारे में बताते है, तब राजगुरु ने कहा था कि उसकी बली मत चढ़ाओ वो सर्प शिवजी की भक्ति में डूबा है। उसकी बली चढाना ठीक नही है। वो सर्प विशिष्ट सर्प है।

पिछले निन्यानबे सालो से वो सर्प महादेव की तपस्या कर रहा है। लेकिन विक्रमादित्य राजगुरु की बात को अनसुना करके नागस्विनी को पकड़कर लाने का आदेश देते है।

सिपाही नागस्विनी को एक पिजरे में पकड़ के ले आते है और विक्रमादित्य यज्ञ में नागस्विनी की बली चढ़ा देता है।

अब विक्रमादित्य उससे कहता है- लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है! मैंने तो तेरी बली चढ़ा दी थी। फिर तुम ज़िन्दा कैसे?

नागिन: क्योकि, मेरे महादेव ने इंसाफ किया। मुझे फिर से तेरे ही राज्य में जन्म दिया। उन्हीं की कृपा से मुझे मेरे पिछले जन्म के बारे में याद आया और मै अपने एक ओर रूप नागस्विनी को पहचान सकी।

विक्रमादित्य : मतलब तुम पच्चीस साल बाद लौटी हो, नागस्विनी
नागिन : हाँ , विक्रमादित्य में नागस्विनी फिर आई हूं।

मै ही हु वो नागस्विनी जिसकी बली चढ़ाने से तुझे राजगुरु ने मना किया था। फिर भी तूने उनकी एक बात नही सुनी थी। आज फिर तूने वही किया है। आज फिर तूने बात नही सुनी। लेकिन अब बस, बहुत हुआ अब तुझे तेरी मौत से मिलाने में जरूर आउंगी।

राजा : आना जरूर आना, मै भी देखता हूं तू क्या करती है मेरे साथ।
नागिन: इतना अभिमान है तुझे खुद पर ! तो अब सुन तेरा काल में जल्द ही बनूँगी।

नागिन यामिनी के पुत्री पर हाथ रखती है और कहती है- आज नागपंचमी है और आज मेरी पूजा करने की जगह तूने मेरा अपमान किया है। विक्रमादित्य, मै चाहूँ तो इसी समय तेरे जीवन की रेखा समाप्त कर सकती हूं।

लेकिन नही में ऐसा नही करूँगी। तुझे तो अब ऐसी मौत दूंगी की पूरी दुनिया काँप उठे। मै इस पुत्री की कसम खाती हूँ कि नागपंचमी के दिन लौट के आउंगी और मेरा इंतकाम लुंगी।

आज तक लोगो ने नागिन के माँ-बाबा के मोत के बदले की कहानी सुनी होगी। लेकिन अब नागिन के खुद के मौत और अपमान के बदले की कहानी सुनेगे।

इतना बोलकर वो वहां से सर्प बनकर चली जाति है। विक्रमादित्य, पंडित को भेट में देते हुए कहते है- पंडित तूने हमारी जान बचाई है, इसलिए ये तोफा हमारी तरफ से।

इस तरफ नागिन राजमहल से दूर एक महारुद्र शिव मंदिर में जाति है और मनुष्य रूप में आती है।

वह अत्यंत क्रोधित होती है। गुस्से में शिवलिंग के सामने तांडव करने लगती है। उसका का गुस्सा उसपे हावी होने लगता है। उसकी आखों में अपमान का गुस्सा दिखाई देता है।

क्रोध में तांडव करते करते उसको उसके नागिन रूप का आरंभ याद आने लगता है। क्योंकि आज उसको इच्छाधारी नागिन बने हुए पूरा एक महीना हो चुका है।

एक दिन आधी रात में वह घर से भाग जाती है। भाग कर वो जंगल मे चली जाती है और एक बड़े पेड़ के नीचे बैठती है। वह अपनी आँखें बंध करके ‘ओम नमः शिवाय।’ का जाप करने लगती है।

धीरे धीरे वह शिवजी के तप में इतनी मशगूल हो जाती है की उसे आसपास क्या हो रहा है उसे कुछ भी नही पता। बारिश हो या आंधी तूफान कुछ भी हो जाये पर वह शिवजी के ध्यान में डूबी हुई होती है।

कहानी अभी बाकी है इसका अगला भाग जल्द ही आएगा….

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